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हिंदी भारत की आत्मा है: डॉ.रामाशीष राय

डॉ.रामाशीष राय
14 सितंबर हिंदी दिवस ही हमारे देश की आत्मा है। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया, परंतु स्वतंत्रता के इतने  वर्षों बाद भी हिंदी को वह सम्मान और स्थान नहीं मिल सका, जिसका वह वास्तविक रूप से हकदार है| सरकारी प्रतिष्ठान हिंदी पखवाड़ा तो मानते हैं, प्रचार प्रसार पर धन भी खर्च होता है, किंतु यह औपचारिकता तक सीमित रह जाती है।
दुनिया का इतिहास गवाह है कि कोई भी भाषा तभी फलती फूलती है जब वह जनजीवन, आम बोलचाल और श्रमजीवी वर्ग से जुड़ी हो, जब लोगों के स्वाभिमान और सम्मान का प्रतीक बन जाए। भारत में हिंदी आजादी के आंदोलन से गहराई से जुड़ी एक एक सरल और सशक्त भाषा रही है, जो संपूर्ण भारत में आसानी से बोली और समझी जाती है। भारत की अधिकांश भाषाओं की जड़े संस्कृत में है, और हिंदी उसी की सहज देन है। उर्दू भी हिंदी की ही एक शाखा कहीं जा सकती है, केवल लिपि का अंतर है। ” हिन्दी” शब्द का मूल सिन्धु से है। प्राचीन काल में सिन्धु नदी के पर रहने वालों को हिंदू कहा जाता था और उनकी बोली को हिन्दी। किस प्रकार हिंदी का इतिहास भारत की सांस्कृतिक धारा से गहराई से जुड़ा हुआ है।
दुनिया के लगभग सभी विकसित देशों जैसे चीन, रूस, जापान, स्वीडन, तुर्की, इजराइल आदि ने अपनी मातृभाषा को अपना कर प्रगति की ऊंचाइयों को छुआ है। वह अपनी भाषा में ही विज्ञान, तकनीक और शिक्षा का विकास कर गर्व से आगे बढ़े हैं। इसके विपरीत भारत आज भी कहीं कहीं अंग्रेजी के मोह और मानसिक गुलामी से मुक्त नहीं हो पाया है। हिंदी को पीछे धकेलने में विडंबना यह है की सबसे बड़ी भूमिका हिंदी भाषियों की ही रही। इसमें से कई लोग अपनी भाषा पर गर्व करने के बजाय विदेशी भाषाओं का अंधानुकरण करते हैं। आजादी के बाद भी हिंदी को रोजगार और उच्च शिक्षा से जोड़ने की ठोस नीतियां नहीं बन पाई।
बाहर के देशों में लोग अपने मकान, दुकान और प्रतिष्ठानों के नाम अपनी मातृभाषा में बड़े गर्व से लिखते हैं, जबकि भारत में कई लोग आधुनिक दिखने की चाह में अपने ही प्रतिष्ठा के नाम अंग्रेजी में लिखवाने को प्रतिष्ठा समझते हैं। यह मानसिकता हमें अपने स्वाभिमान से दूर ले जाती है। हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की विविधताओं को जोड़ने वाला सेतु है। यह भारत के अतीत, दर्शन, पुराण, महाकाव्य रामायण, महाभारत, वेद और उपनिषदों की भाषा की उत्तराधिकरणी है। विदेशों में भी भारत को जानने, भारतीय संस्कृति और व्यापार से जुड़ने के इच्छुक लोग हिन्दी सीख रहे हैं।
हमें आवश्यकता है कि भारत में हिंदी को रोजगार, तकनीक और उच्च शिक्षा से जोड़ने वाली ठोस योजनाएं बनाई जाएं। सरकार के साथ-साथ हमें भी अपने घर, व्यापार और रोजमर्रा की जिंदगी में हिन्दी को सम्मान देना चाहिए। तभी हम हिंदी को उसका वास्तविक गौरव दिला पाएंगे और एक दिन हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाओं में स्थान दिलाने का सपना भी सरकार कर सकेंगे।
लेखक राष्ट्रीय लोक दल के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष है।

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