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प्रदेश के कृषकों को आगामी सप्ताह हेतु मौसम आधारित कृषि परामर्श जारी

लखनऊ: 27 जुलाई, 2023

क्रॉप वेदर वॉच गु्रप की वर्ष 2023-24 की 8वीं बैठक डा. संजय सिंह, महानिदेशक उ.प्र. कृषि अनुसंधान परिषद की अध्यक्षता में दिनांक 27 जुलाई, 2023 को उ.प्र. कृषि अनुसंधान परिषद में सम्पन्न हुई। प्रदेश में मौसम के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में किसानों को अगले सप्ताह कृषि प्रबन्धन के लिए विशेषज्ञों द्वारा महत्वपूर्ण सुझाव दिये गये हैं।
उ.प्र. कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिक अधिकारी एवं मीडिया प्रभारी विनोद कुमार तिवारी ने जानकारी दी कि विशेषज्ञों द्वारा बताया गया है कि आगामी सप्ताह के आरंभिक चरण के दौरान पूर्वी उत्तर प्रदेश में वर्षा की मात्रा कुछ अंचलों तक सीमित रहने की संभावना है, तदोपरांत पूर्वी उत्तर प्रदेश में वर्षा के क्षेत्रीय वितरण एवं तीव्रता में वृद्धि होने से पूर्वी उत्तर प्रदेश के लगभग सभी अंचलों में हल्की से मध्यम वर्षा होने के साथ कहीं-कहीं भारी वर्षा होने की भी संभावना है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस सप्ताह के दौरान लगभग सभी अंचलों में हल्की से मध्यम वर्षा का दौर जारी रहने के साथ कहीं-कहीं भारी वर्षा होने की भी संभावना है। इस दौरान राज्य में कुछ स्थानों पर मेघ गर्जन के साथ वज्रपात होने की भी संभावना है। द्वितीय सप्ताह 03 से 09 अगस्त तक प्रदेश के अधिकांश अंचलों में गरज-चमक के साथ हल्की से मध्यम वर्षा होने की संभावना है।
इन मौसमी दशाओं के दृष्टिगत किसानों से अपेक्षा रखी गयी है कि खरीफ फसलों की बुवाई पर्याप्त नमी की दशा में ही करें। यदि बुआई में विलम्ब हो रहा हो तो दलहनी, तिलहनी व श्रीअन्न फसलों की कम अवधि की सूखा सहनशील किस्मों की बुआई की जाय। दलहनी व तिलहनी फसलों में घने पौधों का विरलीकरण (थिनिंग) कर पौध संख्या कम रखी जाय तथा मल्च के रूप में बायोमास (जैव उत्पाद) का प्रयोग किया जाय। सब्जियों तथा दलहनी व तिलहनी फसलों में जीवन रक्षक सिंचाई हेतु क्यारी तथा बरहा विधि अथवा एकान्तर पंक्ति विधि को अपनायें। खेतों मे मेड़बन्दी करके नमी को संरक्षित करें तथा तालाबों, पोखरों एवं झीलों में संरक्षित वर्षा जल को फसलों की क्रान्तिक वृद्धि की दशाओं में सिंचित करने के लिये उपयोग में लायें। इसके लिए स्प्रिंकलर एवं ड्रिप सिंचाई अपनाकर फसलों को बचायंे। दलहनी एवं तिलहनी फसलों में जल भराव न होने दें।
अल्प वर्षा वाले जनपदों में धान्य फसलों की सूखा के प्रति सहनशीलता बढ़ाने हेतु 2 प्रतिशत यूरिया एवं 2 प्रतिशत म्यूरेट ऑफ पोटाश के घोल का छिड़काव करें। संबंधित विभागों को निर्देशित किया जाय कि नहरों/नलकूपों की नालियों को ठीक दशा में रखंे, जिससे आवश्यकतानुसार जीवन रक्षक सिंचाई उपलब्ध कराई जा सकें।
धान की रोपाई का कार्य कृषक यथाशीघ्र पूर्ण करें। धान की ‘‘डबल रोपाई या सण्डा प्लाटिंग’’ हेतु दूसरी रोपाई पुनः पहले रोपे गये धान के 03 सप्ताह बाद 10×10 सेमी. की दूरी पर करें। विलम्ब से धान की रोपाई करने पर अधिक अवधि वाली पाैंध (30-35 दिन) की रोपाई 2-3 पौध प्रति पंुज के स्थान पर 3-4 पौध की रोपाई प्रति पुंज करें। विशेष रूप से ऊसर एवं क्षारीय भूमियों में 3-4 पौध की रोपाई प्रति पुंज करें।
कम वर्षा वाले क्षेत्रों में बाजरा की संकुल किस्मों घनशक्ति, डब्लू.सी.सी.-75, आई.सी.एम.बी.-155, आई.सी.टी.पी.-8203, राज-171 तथा न.दे.पफ.बी.-3 तथा संकर किस्मों 86 एम 84, पूसा-322, आई.सी.एम.एच.-451 तथा पूसा-23 की बुवाई करें। कोदों की किस्मों यथा जी.पी.वी.के.-3, ए.पी.के.-1, जे.के.-2, जे.के.-62, वम्बन-1 व जे.के.-6 की बुवाई करें। मूंग की किस्मों यथा आजाद मूंग-1, पूसा-1431, मेहा 99-125, एम.एच.-2.15, टी.एम.-9937, मालवीय, जनकल्याणी, मालवीय, जनचेतना, मालवीय जनप्रिया, मालवीय जागृति, मालवीय ज्योति, पंत मूंग 4, नरेन्द्र मूंग-1, पी.डी.एम.-11, आशा, विराट एवं शिखा की बुवाई करें। बीज का उपचार मूंग के विशिष्ट राइजोबियम कल्चर से अवश्य करें। उर्द की किस्मों यथा शेखर-1, शेखर-2, शेखर-3, आई.पी.यू.-94-1, नरेन्द्र उर्द-1, पंत उर्द-9, पंत उर्द-8, आजाद-3, डब्लू.बी.यू.-108, पंत उर्द-31, आई.पी.यू.-2-43, तथा आई.पी.यू.- 13-1 की बुवाई करें। बीज का उपचार उर्द के विशिष्ट राइजोबियम कल्चर से अवश्य करें।
तिल की उन्नतशील किस्मों यथा गुजरात तिल-6, आर.टी.-346, आर.टी.-351, तरूण, प्रगति, शेखर टाइप-78, टाइप-13, टाइप-4, आर.टी.-372 व टाइप-12 की बुवाई करें। तिल में फाइलोडी रोग से बचाव हेतु आक्सीडिमेटान मिथाइल 25 प्रतिशत ई.सी. 01 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। मूॅंगफली में खरपतवार नियंत्रण हेतु इमेजाथापर 750 मि.ली. प्रति हे. की दर से बुवाई के 25 से 30 दिन उपरांत प्रयोग करें।
जलभराव वाले गन्ने की फसल में पानी निकलने के बाद 2 प्रतिशत यूरिया तथा 2 प्रतिशत म्यूरेट आफ पोटाश के घोल का छिड़काव करें। जिन क्षेत्रों में वर्षा नहीं हुई है वहां गन्ने के खेत में नमी बनाये रखने हेतु सतह पर हल्की गुड़ाई (डस्ट मल्चिंग) करें। पोक्का बोइंग को नियंत्रित करने के लिये कापर आक्सीक्लोराइड 0.2 प्रतिशत अर्थात 100 लीटर पानी में 200 ग्राम की दर से अथवा वावस्टीन 0.1 प्रतिशत की दर से अर्थात 100 लीटर पानी में 100 ग्राम की दर से 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
गोल बैंगन, मध्य कालीन फूल गोभी तथा शिमला मिर्च की अगस्त माह में रोपाई हेतु बीज की बुवाई उठी हुई क्योरियों तथा लो टनल में करें। हल्दी एवं अरबी में जल निकास का उचित प्रबन्ध करें। टमाटर की अगेती संस्तुत किस्मांे की बुवाई करें। आम, अमरूद, लीची, आंवला, नींबू, चिरौंजी, लसोढ़ा, महुआ तथा अन्य फलदार पौधों का रोपण करें। आम की रंगीन संकर किस्मों अम्बिका, अरूणिका, पूसा श्रेष्ठ आदि प्रजातियों का रोपण करें।
वर्तमान में खुरपका एवं मुहपका बीमारी (एफ.एम.डी.) का टीकाकरण सभी पशुचिकित्सालयों में कराया जा रहा है। यह सुविधा सभी पशुचिकित्सालयों पर निःशुल्क उपलब्ध है। बड़े पशुओं में गलाघोटू की रोकथाम हेतु एच.एस. वैक्सीन से तथा लंगड़िया बुखार की रोकथाम हेतु बी क्यू वैक्सीन से टीकाकरण करायें। लम्पी स्किन रोग (एलएसडी) एक विषाणु जनित रोग है, जिसकी रोकथाम हेतु पशुपालन विभाग द्वारा टीकाकरण प्रोग्राम चलाया जा रहा है। सभी कृषक/पशु पालक अपने निकटतम पशु चिकित्सालय से सम्पर्क कर इसकी रोकथाम संबंधी उपाय एवं टीकाकरण की जानकारी ले सकते हैं।
अजोला की खेती को प्रदेश के पशुपालकों को बड़े पैमाने पर अपनाये जाने हेतु प्रोत्साहित किये जाने की आवश्यकता है। अजोला कम अवधि में तैयार हो जाती है जिसमें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन होती है। निगम की हैचरियों पर मत्स्य बीज उपलब्ध है। अतः सभी मत्स्य पालक अपने तालाबों में मत्स्य बीज संचय करें और मत्स्य बीज का मांग पत्र जनपद स्तर पर मत्स्य विभाग को कार्यालय में जमा कर दें। वृहद वृक्षारोपण कार्यक्रम के अन्तर्गत लगाये गये पौधों की समुचित देखभाल करें।

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